जब मैं कलम उठाता हूं (jab main kalam uthata hun)
 
 
 
जब मैं कलम उठाता हूं तो
मन कुछ कहने लगता है
जज़्बातों का मीठा दरिया 
अन्तर्मन में बहने लगता है
जज़्बातों के उस दरिया में 
मैं भी बहने लगता हूं
जो शब्द घुल गए दरिया में
उन्हें मैं कलम से कहने लगता हूं
adult, diary, journal
मेरे मन में भाव कभी जब 
घुमड़ घुमड़ कर आते हैं
ढल कर के शब्दों के रूप में
वो दुनिया देखना चाहते हैं

 

कितने मंजर कितने चेहरे
कितने पराये कितने मेरे
मेरे अंतस्तल मे ये सतरंगे भाव जगाते हैं
जब भाव मचलने लगते हैं
तब ये हृदय शब्द बन जाते हैं

 
 
 
अक्षर अक्षर से शब्द बने
शब्दों में अद्भुत भाव भरे 
कुछ दिल को बहला जाते हैं
कुछ शब्द दिलों पर घाव करें

 

शब्दों के रंग और रूप लिए 
भाव कागज पर उतर गए
कुछ ने जगह बनाई दिल में
कुछ अम्बर में तारों जैसे बिखर गए

 
शब्द मेरे भावों की निर्झर 
सरिता में बहना चाहते हैं
आस और प्यास से भरे हैं इतने
ये कितना कुछ कहना चाहते हैं
कुछ नादान ख्वाहिशें बन कर 
किसी के मन तक पहुंचने वाले हैं
कुछ नादान अरमान मचल कर 
मेरे दिल में ही रह जाने वाले हैं
शब्द शब्द से मिल कर निखरे
भावों के सारे रस बिखरे 
किसी के हृदय का ये आलिंगन कर लें
पर किसी के मन को खूब ये अखरे

 

शब्द कभी तितली बन जाते 
कभी खंजर बन कर वार करें
कभी प्यासे मन के पानी बन जाते
तो कभी आर या पार करें
लफ़्ज़ों की कैसी कायनात है 
इनमें दिन प्यारे और चांद रात है
जीवन के सारे रंग इन्हीं में
इनमें झलकती दिल की बात है
कभी दर्द तो कभी बेक़रारी का सबब बन जाते हैं
खानाबदोश लफ्ज़ कभी दिल में घर कर जाते हैं
कुछ जी उठते हैं इन्हें सुनते ही
तो कुछ इनके छू जाने से ही मर जाते हैं
काली स्याही में डूबे ये बे-क़रार हर्फ़
शक्ल-ए-अशआर इख़्तियार किए बैठे हैं
कुछ दे रहे हैं दस्तक उसके दर-ए-दिल पर
कुछ मुझे बे-करार किए बैठे हैं
 
लफ़्ज़ों के रंगीं धागों में लिपटी
कभी बैचेनी तो कभी ख़ुमारी है
बला है इनकी मिज़ाज-ओ-फितरत
ये कैसी तिलिस्मकारी है