Inestimable Nature: A Poetic Tribute to Nature

Inestimable Nature

Love and Tribute to the Nature by Vijay Bisht ‘Pahadi’

 

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यह कौन चित्रकार है

सृष्टि प्रसन्न हो तो

भुवन रच देती है

प्रकृति प्रसन्न हो तो

सुमन रच देती है

जलाकाश भूमि अग्नि वायु

कैसे सृष्टि के आधार हैं

कैसे मृत्युलोक में ये

जीवन के सूत्रधार हैं

सृष्टि के ये कैसे तत्व हैं

कैसे प्रकृति के अस्तित्व हैं

ये कौन भूपटल पर खड़े

ये कौन से व्यक्तित्व हैं

प्रकाश के हैं पुंज कैसे

अंधकार कैसे हैं घने

सूर्य चन्द्र असंख्य तारे

किस तत्व के ये हैं बने

अग्नि में है ताप कैसे

शीतल क्यों इतना जल हुआ

इनके बिना संभव नहीं कुछ

कैसे अद्भुत यह युगल हुआ

यह सब कौन कैसे कर रहा

विस्मय से मुझको भर रहा

पैरों के नीचे भूमि कैसे

सिर के ऊपर अम्बर रहा

बिंदु बिंदु सागर बने

क्षण बने चिरकाल

माया सृष्टि अबूझ है

बीज बन गए वृक्ष विशाल

क्या यह कोई भ्रम जाल है

यह अनुत्तरित सवाल है

यथार्थ है या कल्पना

या कोई मायावी चाल है

जलाकाश भूमि अग्नि वायु

सृष्टि रचना के स्नायु

अद्भुत ये पंच भूत हैं

जीवन यज्ञ में आहूत हैं

श्वासों के कैसे झंझावात हैं

जो चल रहे दिन रात हैं

ये स्पंदनों के चक्र कैसे

कुछ तो विशेष बात है

दिन भर चमकता सूर्य कैसे

रात्रि प्रहरी कैसे चन्द्र है

सब अनुशासनों में चल रहे

यह कैसा गूढ़ मन्त्र है

हिमशिखर की श्रृंखला

हरे भरे ढलान हैं

फल रहे फल फूल से

आखिर किसके ये बागान हैं

फूलों से सुगंध की 

कैसे बह रही बयार है

कोष खुले हैं रंग रुप के 

इतना कौन यह उदार है

नदियों में है प्रवाह कैसे

कैसे बह रही समीर है

आखिर किसका यह सौजन्य है

यह कौन दानवीर है

बादल बिजली चन्दन पानी

चंहुओर खिंची है चादर धानी

यौवन प्रकृति का छलक रहा है

कैसी अचरज भरी कहानी

कहीं पर्वतों के साम्राज्य हैं

कहीं मैदान के विस्तार हैं

कहीं प्रचंड ऊष्ण मरुभूमि है

कहीं पाहन से बने पठार हैं

प्रातः की यह अरुणिमा

मधुर है भाव भंगिमा

सांध्य भी मदिर बड़ी

मन मोहती है लालिमा

घनघोर रात्रि कालिमा में

श्वेत हिमशिखर धवल खड़ा

अरुणिमा और लालिमा में

मानो स्वर्ण सब पिघल पड़ा

भू भाग को घेरे हुए

समुद्र भी विशाल हैं

शिखर से गहराइयों तक

यह कैसा इन्द्रजाल है

कभी सूर्य के प्रकोप हैं

कभी मेघ घटाटोप हैं 

सुखद है तो दुखद भी है 

कभी प्रचंड कोप है

घनघोर घटा यामिनी

तड़ित त्वरित दामिनी

कड़क रही आवेश में

जैसे कोई चेतावनी

मेघ के प्रचंड नाद हैं

नदी के कल कल निनाद हैं

शीतल शांत तरंगिणी में

बाढ़ के उन्माद हैं

सावन में प्रसन्न हरितिमा

फल फूल के अम्बार हैं

सूर्य क्रोध में प्रतीत हों तो

ग्रीष्म ऊष्ण की कटार है

जीवन के कितने भेद हैं

सुख दुख सदा समवेत हैं

कभी अभाव सा प्रतीत हो

कभी लगे सभी अभिप्रेत है

जीवन अविराम सृजन है तो

मृत्यु है परम अटल

जीवन मरण सृजन विनाश 

सृष्टि के रंगमंच के पटल

यह सृष्टि कितनी भव्य है

सदा से ही यह दिव्य है

सृष्टि अनंत से अनंत तक

यह अविराम है यह नित्य है

विवधा भरा यह चित्रपट

किसकी कल्पना साकार है

सुंदर सृजन है हर तरफ

यह कौन चित्रकार है

पटकथा यह किसकी है

यह कौन कथाकार है

नित अध्याय नया लिख रही 

उस लेखनी को नमस्कार है !

उस लेखनी को नमस्कार है !

उस लेखनी को नमस्कार है !

Love and Poetic Tribute to the Nature by Vijay Bisht ‘Pahadi’

24 thoughts on “Inestimable Nature: A Poetic Tribute to Nature”

  1. The imagery in your poem is so vivid—it paints pictures in the mind and touches the heart in a profound way. Truly a piece of art that speaks beyond words.

    1. So nice of you for your so insightful poetically inspiring words 🙏
      Spread this poetic statement in admiration of nature with your loved ones to give them an opportunity to feel what you felt.
      Thanks a lot, Keep inspiring

  2. Yogendra Manral

    Great.dada kabhi itni lambi kavita sayad kafi samay bàad padi.nature key lagbhag har pahlu ko chooti hai.nice

    1. हृदय से आभार सर जी, आनंद लीजिए और मित्रों के साथ साझा भी कीजिए .

  3. सादर नमस्कार आदरणीय मित्र अद्भुत सुंदर प्रकृति संरचना आपकी लेखनी को साधुवाद ईश्वर आपकी लेखनी को अपार कृपा से अभीसिंचित करें प्रकृति मां आशीष दे

    1. इस रचना के निर्माण में आपके प्रकृति प्रेम से प्राप्त प्रेरणा का विशेष योगदान है, बहुत बहुत धन्यवाद और स्नेह भट्ट जी

  4. पुनीत उपाध्याय

    निरंकार के संसार का काव्य रूप रच दिया आपने
    मन की जिज्ञासाओं के साथ

    1. यह सब आपकी शुभकामनाओं का प्रतिफल है, ऐसा ही स्नेह देते रहिए, रचना को मित्रों के साथ साझा करिएगा

  5. Aapke shabdon mein prakriti ki shanti aur sundarta dono hi mehsoos hoti hain.” 🌸
    “Shabdon ke madhyam se prakriti ko itna jeevant bana dena aapki kala ko prakat karta hai.” 🌼

  6. ,Let me congratulate you on your excellent creation on nature’s creation. It’s vivid, divine and infinitely dreamy but at the same time real too. Appreciate your creative process.

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