‘Vinash Hi Vinash Hai’ captures the harsh reality of today’s global conflicts, showing that world is divided by religion, power and borders, where the powerful dominate and ordinary people suffer. It highlights that wars ultimately bring only destruction and remind us of life’s impermanence. Yet, despite history’s lessons, humanity continues repeating the same mistakes—keeping true peace out of reach.
विनाश ही विनाश है
कहीं संघर्ष कहीं जिहाद है
कहीं दंगा कहीं फ़साद है
रिस रहे हैं घाव सारे
मवाद ही मवाद है
कहीं धर्म नस्ल के झगड़े
कुछ अगड़े हैं कुछ पिछड़े हैं
कुछ सबको रौंदते दौड़ रहे हैं
कुछ दोनों पैरों से लंगड़े हैं
झगड़ों का बड़ा पिटारा है
कहीं जमीनों का बंटवारा है
ताकत जिसके हाथों में है
उसकी शर्तों पर निपटारा है
कहीं हद है कहीं सरहद है
कहीं बबूल है कहीं बरगद है
अपने अपने दावे हैं सबके
अन्तर विरोध तो बेहद है
अमेरिका विरुद्ध ईरान है
अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान है
ईरान इजराइल भी अड़े हुए
सारे स्वघोषित महान हैं
कहीं इजराइल कहीं फिलिस्तीन है
कहीं भारत है कहीं चीन है
रूस यूक्रेन भी कहां अलग हैं
द्वन्द यह पुरा युगीन है
आसमान से गिरते जलते पासे
नीचे खून से लथपथ बिखरी लाशें
मौत सर पर नाच रही है
हलक में अटकी सबकी सांसें
आसमान में घूम रहे हैं
आग उगलते उड़न खटोले
शोलों की पागल बारिश है
नीचे जिस्मों पर पड़े फफोले
शैतान मेहरबान हैं
इंसान परेशान हैं
विनाश ही विनाश है
बर्बादियों के निशान हैं
रहता कुछ भी चिर पर्यन्त नहीं
फिर भी झगड़ों का अंत नहीं
अपने अपने मत हैं सबके
सर्वमान्य कोई भी पंथ नहीं
कितने आए और आ कर चले गए
कुछ खेल गए कुछ छले गए
खो गए सब दुनिया में आ के
सांचे में काल के ढले गए
कुछ दफ्न हुए कुछ भस्म हुए
कुछ सत्य हुए कुछ छद्म हुए
लड़ते-लड़ते मर गए सारे
किस्से सारे ख़त्म हुए
शब्द संवेदना : विजय बिष्ट ‘पहाड़ी’
‘विनाश ही विनाश है’ कविता वर्तमान वैश्विक परिदृश्य, विशेषकर ईरान, अमेरिका और इज़राइल के युद्ध, के माध्यम से मानव सभ्यता की विडंबना को उजागर करती है।
दुनिया विभिन्न रूपों में बंटी हुई है, धर्म, नस्ल, सत्ता और सीमाओं के आधार पर, जहाँ शक्तिशाली अपने नियम थोपते हैं और आम इंसान पीड़ा, हिंसा और विनाश का शिकार बनता है।
इतिहास भी गवाह है कि युद्ध और संघर्ष अंततः केवल बर्बादी, मृत्यु और क्षणभंगुर अस्तित्व की याद छोड़ते हैं। बावजूद इसके, मानवता बार-बार वही गलतियाँ दोहराती है। कविता का मूल संदेश यह है कि जब तक अहंकार, अधिपत्य और सत्ता की लालसा बनी रहेगी, तब तक शांति एक अधूरा सपना ही रहेगी
Exquisite..
“In the grand theater of nations, war parades as chaos’s hero while peace masquerades as order’s saint—yet both are but masks for the eternal hunger of power.”
Exquisite..
“In the grand theater of nations, war parades as chaos’s hero while peace masquerades as order’s saint—yet both are but masks for the eternal hunger of power.”