लफ़्ज़ों की कैसी कायनात है
इनमें दिन प्यारे और चांद रात है
जीवन के सारे रंग इन्हीं में
इनमें झलकती दिल की बात है
कभी दर्द तो कभी बेक़रारी का सबब बन जाते हैं
खानाबदोश लफ्ज़ कभी दिल में घर कर जाते हैं
कुछ जी उठते हैं इन्हें सुनते ही
तो कुछ इनके छू जाने से ही मर जाते हैं