मैं कोहरा हूं

मैं कोहरा हूं

 

Dense fog

काली घटाओं का सफेद चेहरा हूं

चमकते सूरज पर लगा सख़्त पहरा हूं

जब मैं होता हूं तो फिर बस मैं ही मैं होता हूं

आंखो पर छा जाने वाला रंग सुनहरा हूं

 

जब मैं अपनी पर आ जाता हूं

संपूर्ण क्षितिज पर छा जाता हूं

दृश्य शून्यता से आवागमन की

संभावनाओं को खा जाता हूं

 

सूरज अंधेरों की धज्जियां उड़ाता होगा

पर मैं सूरज को भी फंसा देता हूँ

जो अपनी पर आ जाऊं तो

मैं सूरज को भी गहरा धंसा देता हूँ

 

सूरज से सूरज होने का अहसास छीनने वाला

मैं सर्दियों की चाल का एक मोहरा हूं

दिखता हूं दिलफरेब सा

मगर फितरत से मैं दोहरा हूं

मैं कोहरा हूं

 

मैं कोहरा हूं!

5 thoughts on “मैं कोहरा हूं”

  1. सुरेश कुमार सिंह

    बहुत सुंदर कविता लिखी है सर 🙏 आपका चिंतन, परिस्थितियों और घटनाओं का मूल्यांकन/आकलन का कोई जवाब नहीं शब्दों की ऐसी माला तैयार करते हैं आपकी कविता को पढ़ने और सुनने के बाद दिल को गजब का सुकून मिलता है
    जय हिंद

  2. कोहरे के कहर को अभिव्यक्त करती अप्रतिम कविता। “मैं हूं” सीरीज का एक और नायाब कवित्त रचना के लिए आकाश भर साधुवाद।

    1. बहुत बहुत शुक्रिया आपकी हौंसला अफजाइयों का
      मैं तो पहले से ही कायल था आपकी अच्छाइयों का
      ये महफिलें लूटने वाले क्या जाने
      कितना हसीन होता है साथ तन्हाइयों का ❤️❤️❤️
      🙏🙏🙏

  3. दृश्य शून्यता से आवागमन की
    संभावनाओं को खा जाता हूं
    ————
    ये कोहरा दृश्य शून्य की धज्जियां उड़ाता होगा
    पर हम शिक्षक हैं कोहरे को भी फंसा देते है
    सुबह वाली ड्यूटी करके कोहरे को भी हरा देते है।

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